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Monday, August 19, 2019

काँवड़ यात्रा : मेरा अनुभव (भाग १)

काँवड़ यात्रा : मेरा अनुभव
#भाग_१

#काँवड़_तैयारी_स्पेशल 
#यात्रा_पूर्व_तैयारी

हाँ तो दोस्तो जैसा कि मेरे सब फ़ेसबुकिया मित्रो को जानकारी होगी कि इस बार मैं पहली बार काँवड़ यात्रा पर गया, करीब १५ दिन पहले मन मे काँवड़ यात्रा का प्लान आया, फाइनल हुआ करीब करीब एक सप्ताह पहले, फिर फ़ेसबुकिया मित्रो से सलाह सुझाव जुटाने के बाद ऑफिस में छुट्टी के लिए अप्लाई किया, और छुट्टी भी मिल गयी जाने से एक दो दिन पहले, 

जाने का प्लान कन्फर्म होते हुए ही तैयारियों का दौर शुरू हुआ, शारीरिक रूप से कोई भी तैयारी करने के लिए शायद एक सप्ताह का समय काफी कम था इसलिए मैंने भी इस और कोई ध्यान नही दिया, तैयारी के नाम पर जरूरत के सामान जुटाना शुरू किया, इसलिए लिए कुछ ऑनलाइन शॉपिंग की जो डिलीवरी एक या दो दिन में दे रहे थे केवल वही सामान खरीदे, क्योंकि मैं एक नम्बर का आलसी जीव हूँ इसलिए मार्किट जाकर शॉपिंग करने से बेहतर मुझे ऑनलाइन ही लगता है और इसी का आदि हूँ, 

#जरूरी_सामान
जरूरी सामान में एक छोटा वाटरप्रूफ बैग, जो वजन में भी हल्का हो, एक मजबूत टिकाऊ बेल्ट नुमा पेटी (कमर पर बांधने वाला बैग) जाँघ पर पहनने वाली पट्टियां, पिंडलियों पर पहनने वाली पट्टियां, पैर यानी तलुवे पर पहनने वाली पट्टियां (सबसे ज्यादा जरूरी), हल्के सूती कपड़े, दो से तीन जोड़ी (लोअर टीशर्ट हो तो बेहतर), दो बड़े लेकिन हल्के और सूती गमछे तौलिये, दवाइयां ( जिनमे पेनकिलर, बुखार, दस्त , दर्द निवारक ट्यूब स्प्रे, और जाँघ लगने पर लगाने वाली ट्यूब प्रमुख है) यदि मोबाइल ले जा रहे है तो अच्छी कैपिसिटी का पावर बैंक और चार्जर, और सबसे जरूरी सामान पैसे रखना ना भूले,

इन सब से पहले यदि कुछ चाहिए वो है अटूट श्रद्धा और ईश्वर और खुद से ज्यादा विश्वास, यात्रा के दौरान कई ऐसे दौर भी आएंगे जब आप मानसिक और शारीरिक रूप से थक चुके होंगे तब ये विश्वास ही आगे बढ़ने की हिम्मत देगा अन्यथा आप लिफ्ट लेकर या बस ट्रेन पकड़ कर यात्रा बीच मे छोड़ने से गुरेज नही करेंगे, 

#जरूरी_समय

यात्रा शुरू करने से पहले खुद की क्षमताओं का आंकलन बेहद जरूरी है, आपका रहन सहन दिनचर्या किस तरह की ये बेहद महत्वपूर्ण है, 
यदि शहरी आप आराम तलब जिंदगी जी रहे है तो रोजाना ३० किमी से ज्यादा का लक्ष्य बिल्कुल ना रखें, 
यदि दैनिक जीवन मे शारीरिक श्रम भी करते है तो ३० से ४० किमी प्रतिदिन तक जा सकते है इस से ज्यादा नही, 
यदि कठिन शारिरिक श्रम के आदि है तो ४०-५० किमी तक चल सकते है, 
यदि अत्यधिक कठिन श्रम करते है तब ही ५० किमी से ज्यादा चलने के बारे में सोचे, इसके लिए  आपकी चलने का अच्छा खासा अनुभव होना चाहिए, हल चलाने वाले किसान जैसा मेहनतकश ही इस बारे में सोच सकता है,

अब अपनी तय की जाने वाली दूरी और अपनी क्षमता के हिसाब से समय का आकलन कर एक अतिरिक्त दिन लेकर यात्रा प्रारंभ कर सकते है, 

#सुझाव

यात्रा के आपके साथ किसी साथी का होना जितना जरूरी है उस से ज्यादा जरूरी है साथी के साथ सामंजस्य, किसी के भी साथ जाने का तभी निर्णय ले जब आओ दोनो एक दूसरे के साथ हर परिस्थिति में साथ रह सकते हो, क्योंकि चलते हुए आप को एक दूसरे का साथ देना होगा,  सबकी स्पीड होती है आप अपनी रफ्तार से कम चलेंगे तो भी थकान जल्दी महसूस करूंगी और तेज चलेंगे तब भी, ऐसे में आपका धैर्य अवश्य जवाब दे जाएगा और आप साथियों को छोड़कर या साथी आपको छोड़कर फरार हो जांएगे और ऐसे में आपका मनोबल ध्वस्त हो जाएगा, 

यदि अकेले जाने का साहस जुटा सकते है तो शायद ये सबसे बेहतर होगा


 #भाग_२ में जारी..

Tuesday, July 16, 2019

झारखंड : ऋचा भारती बनाम मजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह

सोशल मीडिया में ऋचा भारती ने जो लिखा (हालांकि मुझे अभी तक नही पता उसने क्या लिखा था) वो उसकी गलती हो सकती है उसकी सजा मिले यहां तक बात समझ आने वाली थी, 
  
   लेकिन जज मनीष कुमार सिंह कुरान बाटने की शर्त रखकर आखिर करना क्या चाहते है ? क्या ये ऋचा भारती की धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात नही है ? क्या ये जज द्वारा अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करके किसी धर्म के जबरदस्ती प्रचार प्रसार कराने का मामला नही है ? 
  
क्या भारत का महान संविधान और कानून इसकी इजाजत देता है ?  क्या ये धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अतिक्रमण का मामला नही है ? क्या जज सीधे कानून के हिसाब से फैंसले नही सुना सकते ? क्या किसी कानून में इस तरह का कोई प्रावधान है कि जज किसी को किसी धर्म का प्रचार करने के लिए मजबूर करे ?  

  हो सकता है आपको फर्क ना पड़ता हो लेकिन मुझे पड़ता है, इसलिए रजिस्ट्रार जनरल झारखंड ( rgjhc-jhr@nic.in ) और उच्चतम न्यायालय ( supremecourt@nic.in ) को मेल लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया है, तुम भी कर सकते हो 

एडवोकेट कुमार पवन जी के अनुसार

विधि में प्रावधान है कि 
": मजिस्ट्रेट जमानत देते समय न्यायहित मे कोई भी शर्त लगा सकता हैं !

अब किताब में जब प्रावधान पढ़ लिया ..तो जैसा होता हैं ..मच्छिका स्थाने मच्छिका पढ़ने वालो के साथ ? 

किताबी ज्ञान रखने वाला मजिस्ट्रेट जमानत देते समय लगा दिया कुरान की पांच प्रति बांटने की शर्त ..? 

लेकिन वो भूल गया कि ...अभी ये निर्णय करना है कि क्या ऋचा का कथन से 153क के तहत कोई अपराध घृणा फैलाने या शत्रुता फैलाने का बनता हैं ?? 

अब गलती हुई कहां...? 
Cr.P.C. 437 मे..जमानत देने की बात करता हैं ..न कि निर्णय देने की । जमानत देने के कई आधार है ।उन सब की चर्चा यहाँ सम्भव नहीं है ! 

लेकिन पहले ये समझ लेना आवश्यक हैं कि ..जमानत देने की आवश्यकता क्यु पड़ती हैं ? 
एक तरफ कानून कहता हैं कि ..जब तक अभियुक्त को विचारण के बाद दोषी न मान लिया जाये तब तक उसे निर्दोष माना जाना चाहिए ! 
तो फिर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होते हि गिरफ्तार क्यु कर लिया जाता हैं ? 
यहा विचारण के पूर्व गिरफ्तारी अभियुक्त को निर्दोष मानते हुए भी की जाती हैं ! गिरफ्तार इसलिए किया जाता हैं कि ..
1- कही मुजरिम सजा पाने की आशंका से भाग न जाये । या 
2- केस के गवाहो .को धमकाये न ? या 
3- सबूतो से छेड़छाड़ न करे ! 
तो विचारण ( Trial ) के पूर्व ..इन्वेस्टिगेशन के दौरान गिरफ्तार इन्हीं सब कारणो से किया जाता हैं ! 
और जहाँ मजिस्ट्रेट को लगता हैं कि ..
1- मुजरिम विचारण छोड़ कर भागेगा नहीं । या 
2- गवाहो को धमकायेगा नहीं या सबूत से छेड़छाड़ नहीं करेगा तो जमानत पर छोड़ देता हैं ! 
3- यदि प्रथम दृट्या कोई अपराध ही नहीं बनता ..तो अभियुक्त को जमानत पर छोडना पड़ेगा ! 

#विचारण के पूर्व  जमानत के स्तर पर ..शब्दावली " न्याय के हित का क्या मतलब है ??

यहा न्याय के हित का मतलब है..बिना पक्षपात के , बिना व्यवधान के  मामले का ऋजु ( Fair )  विचारण ( Trail ) से हैं .! 
इस स्तर पर न्याय के हित का मतलब है....ऋजु विचारण को सुनिश्चित करना ! 
तो मजिस्ट्रेट ऋजु , पक्षपात रहित मामले के  विचारण को  सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कोई शर्त लगा सकता हैं ! 

अब क्या कुरान की पांच प्रतियो का वितरण...की शर्त मामले के पक्षपात रहित , व्यवधान मुक्त .. ऋजु विचारण को सुनिश्चित करने के लिये हैं ??? 

कुरान की पांच प्रति बांटने से किस तरह मामले का पक्षपात रहित ..विचारण सुनिश्चित होगा ?? 
कदाचित् मजिस्ट्रेट क्या ..हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट का जज भी कोई तार्किक जबाब दे पाये इसका ? 

विचारण में अभी ये निर्णय करना है कि क्या ऋचा का कथन / पोस्ट वास्तव में वर्गो के बीच शत्रुता  भड़काने वाली ..थी ? 

यहाँ मजिस्ट्रेट ने बिना विचारण के ही मान लिया कि ऋचा 153 क की दोषी है ?? 

और दूसरे समुदाय को संतुष्ट करने का प्रयास करने लगा ? 
ये न्याय के हित में नहीं न्याय के विरुद्ध हैं ! 
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जिन मजिस्ट्रेट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अर्नेस कुमार बनाम बिहार राज्य में, सात वर्ष से कम सजा वाले अपराध में गिरफ्तारी के सन्दर्भ में दिये गये गाईडलाईन के पालन को सुनिश्चित करना चाहिए था वो कुरान की प्रतिया बांटने का आदेश दे रहे हैं ??

ये वकीलो व विधिशास्त्रियो की भी जिम्मेदारी है कि इस पर विचार करे और आवाज मुखर करे !!


Friday, December 21, 2018

नसरुद्दीन का किराए वाला डर

२०१४ से जब से हमारे भारत मे केंद्र सरकार बदली है तब से देश मे एक अजीब डर का माहौल पैदा हुआ है जिसकी वजह से एक खास विचारधारा से जुड़े, या एक खास मज़हब वाले सेलिब्रिटी या प्रसिद्ध लोग समय समय पर विभिन्न मंचो में इस डर की घोषणा मीडिया के सामने करते रहे है,

मैंने सोचा इस डर के माहौल में मैं भी अपने डर की बात करु,

मुझे डर क्या होता इसका अहसास तब होता है जब मैं सोचता हूँ किसी दिन परिवार के साथ मैं किसी रेस्टोरेंट में बैठ कर खाना खाते हुए कोई दाढ़ी वाले हथियारबंद बंदूकधारियों का झुंड आकर मुझसे और परिवार से आयते सुनाने को तो नही कहेगा,

मुझे डर का अहसास तब भी होता है जब सोचता हूँ किसी  दिन किसी बस ट्रेन में यात्रा करते हुए कब मेरा कोई दाढ़ी टोपी वाला सहयात्री अल्लाह हुकबर चिल्लाकर पूरी बस को अपने साथ ना उड़ा दे,

इसी डर की वजह से मेरा दिमाग मेरी आँखें कुछ अतिरिक्त सतर्क हो जाती है जब भी आसपास किसी ऐसे  आदमी को देखता हूँ जो अपने छोटे भाई की सलवार और बड़े भाई का कुर्ता पहने हो,

डर क्या होता है ये आपकी गाड़ी/ मोटरसाइकिल की किसी खास मोहल्ले में कम होने वाली स्पीड बता देगी,

डर क्या होता है किसी खास समुदाय के मौहल्ले में रहने वाले आदमी से पूछे जो ना चाहते हुए मजबूरी में अपने घर को आधी पोनी कीमत में बेचने को मजबूर हो,

यदि तुम्हारे घर की महिलाओं को किसी खास मजहब वालो के मोहल्ले से गुजरना पड़ता है तो उसने पूछना डर क्या होता है....

हर गली के नुक्कड़ पर सुरमा लगा कर खड़े आवारा झुंड को देखकर नजर झुका कर, कान बन्द करके, अनचाहे स्पर्श और गंदी शब्दावली, अश्लील हरकतों को नजरअंदाज करने वाली लड़कियों से पूछो की डर क्या होता है,

नसरुद्दीन, आमिर खान जैसे किराए के सुवर ये जो दिन रात डर डर रेंकते है मीडिया में, इन्हें ये डर तब क्यो याद नही आते जब ये आतंकवादियों के लिए दया मांगते है झुंड बनाकर.... इनको असली डर क्या होता है इसका अहसास कराना जरूरी है ताकि ये किराए के डर, और असली डर का अंतर समझ सके,

इन जैसे हरामखोरो को ये बताना जरूरी है ये एक्टिंग का सेट नही है जहाँ डायरेक्टर के बताए डायलॉग बोलकर तालिया मिलेगी, ये एक्टिंग पर्दे के बाहर करेंगे तो तालियों से ज्यादा गालियाँ पड़ेंगी

पगला पंडित