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Friday, December 21, 2018

नसरुद्दीन का किराए वाला डर

२०१४ से जब से हमारे भारत मे केंद्र सरकार बदली है तब से देश मे एक अजीब डर का माहौल पैदा हुआ है जिसकी वजह से एक खास विचारधारा से जुड़े, या एक खास मज़हब वाले सेलिब्रिटी या प्रसिद्ध लोग समय समय पर विभिन्न मंचो में इस डर की घोषणा मीडिया के सामने करते रहे है,

मैंने सोचा इस डर के माहौल में मैं भी अपने डर की बात करु,

मुझे डर क्या होता इसका अहसास तब होता है जब मैं सोचता हूँ किसी दिन परिवार के साथ मैं किसी रेस्टोरेंट में बैठ कर खाना खाते हुए कोई दाढ़ी वाले हथियारबंद बंदूकधारियों का झुंड आकर मुझसे और परिवार से आयते सुनाने को तो नही कहेगा,

मुझे डर का अहसास तब भी होता है जब सोचता हूँ किसी  दिन किसी बस ट्रेन में यात्रा करते हुए कब मेरा कोई दाढ़ी टोपी वाला सहयात्री अल्लाह हुकबर चिल्लाकर पूरी बस को अपने साथ ना उड़ा दे,

इसी डर की वजह से मेरा दिमाग मेरी आँखें कुछ अतिरिक्त सतर्क हो जाती है जब भी आसपास किसी ऐसे  आदमी को देखता हूँ जो अपने छोटे भाई की सलवार और बड़े भाई का कुर्ता पहने हो,

डर क्या होता है ये आपकी गाड़ी/ मोटरसाइकिल की किसी खास मोहल्ले में कम होने वाली स्पीड बता देगी,

डर क्या होता है किसी खास समुदाय के मौहल्ले में रहने वाले आदमी से पूछे जो ना चाहते हुए मजबूरी में अपने घर को आधी पोनी कीमत में बेचने को मजबूर हो,

यदि तुम्हारे घर की महिलाओं को किसी खास मजहब वालो के मोहल्ले से गुजरना पड़ता है तो उसने पूछना डर क्या होता है....

हर गली के नुक्कड़ पर सुरमा लगा कर खड़े आवारा झुंड को देखकर नजर झुका कर, कान बन्द करके, अनचाहे स्पर्श और गंदी शब्दावली, अश्लील हरकतों को नजरअंदाज करने वाली लड़कियों से पूछो की डर क्या होता है,

नसरुद्दीन, आमिर खान जैसे किराए के सुवर ये जो दिन रात डर डर रेंकते है मीडिया में, इन्हें ये डर तब क्यो याद नही आते जब ये आतंकवादियों के लिए दया मांगते है झुंड बनाकर.... इनको असली डर क्या होता है इसका अहसास कराना जरूरी है ताकि ये किराए के डर, और असली डर का अंतर समझ सके,

इन जैसे हरामखोरो को ये बताना जरूरी है ये एक्टिंग का सेट नही है जहाँ डायरेक्टर के बताए डायलॉग बोलकर तालिया मिलेगी, ये एक्टिंग पर्दे के बाहर करेंगे तो तालियों से ज्यादा गालियाँ पड़ेंगी

पगला पंडित

Sunday, February 12, 2017

ISI के जासूस और हम

समुदाय विशेष वाले आकर पुछते हैं कि मध्य प्रदेश में 11 ISI के जासूस पकड़े गये उसपर कुछ कहो,लिखो। दरअसल वह कहना चाहते थे जिस भाजपा को आप राष्ट्रवादी बताते हो उसके ही पार्टी के नेता के रिश्तेदार इसमें लिप्त है,इसलिये क्या आप इसके लिये भाजपा को ISI का एजेंट मानते हो?

मेरे प्यारे मित्र, आपका और आपके जैसे तमाम दोगली सोच वालों की दोगलीयत को सर्वप्रथम दंडवत प्रणाम। कल तक मोदी को शांतीदुत विरोधी और हिटलर बताने के लिये आप जिस पुलिस, ATS, NIA, Intelligence, फौज सबको मोदी के हाथों बिक गयी बताते थे आज उसके ही द्वारा पकड़े गये इन 11 लोगों के लिये आप इन संस्थाओं को शाबाशी दे रहे हैं। आप की इस मोदीविरोध में दोनों तरफ से खाना खा सकने वाली क्षमता का मैं कायल हो गया हूँ।

वैसे शाबाशी तो देनी ही होगी उस म.प्र. पुलिस को जिसे कल तक आप मुख्यमन्त्री शिवाराज सिंह की पुलिस कहते थे और उसके द्वारा भोपाल जेल से भागे गये आतंकीयों को ठोकने की वजह से उसे फेक एनकांउटर कह रहे थे। दरअसल दिक्कत यह थी कि वह भाजपा की सरकार थी और भागने वाले आपके समुदाय के थे। पर चलो आज आपने म.प्र पुलिस कि इस 11 लोगों की गिरफ्तारी पर भरोसा किया है तो यह प्रमाणित होता है कि म.प्र. पुलिस ईमानदार है, और वह एनकांउटर फेक नहीं था।

फिर मैं शाबासी दूँगा ATS को, जिसका इन्हें पकड़ने में योगदान है। वही ATS जिसे कल तक आप कल तक इशरत जहाँ का हत्यारा कहते थे, और मोदी के हाथों खेलने वाले संस्थान बताते थे। पर अब चूंकि ATS ने इन 11 लोगों को पकड़ा है और आप पुरी तरह आश्वस्त हैं कि यह 11 ISI के जासूस थे तो आप इस बात की पुष्टि करते हैं कि ATS जो करती है सही करती है। ATS ने इशरत को मारा बिलकुल सही किया। पर आप कल तक विरोध सिर्फ इसलिये करते रहे कारण इशरत आपके समुदाय की थी।

फिर शाबाशी देते हैं NIA तथा अन्य सुरक्षा एजेंसीयों का भी जिसे कल तक आप हर गिरफ्तारी के बाद समुदाय विशेष विरोधी बताते थे। और इनके द्वारा की गयी हर गिरफ्तारी में गिरफ्तार लोगों को मासुम बताते थे, कारण वह आपके समुदाय के होते थे। पर खैर आज आप जब NIA कि इस 11 गिरफ्तारीयों का स्वागत कर रहे हैं तो मैं मान लेता हूँ कि पहले  की गयी सभी गिरफ्तारीयों को भी आप सही मानते हो।

और अंत में हो सकता है फौज का भी योगदान रहा हो,वही फौज जिसे कल तक आप हत्यारा कहते थे कश्मीरी आतंकीयों को मारने पर, वही फौज जिसके द्वारा कि गयी सर्जिकल स्ट्राइक को आप फेक बताते थे,सबुत माँगते थे। पर आज आपका अचानक फौज पर जागा भरोसा बताता है कि आप फौज की अब तक की सारी कार्यवाई के साथ खड़े हैं,और उसे सही मानते हैं।

और पुरे देश की ओर से शाबाशी दूँगा भाजपा जैसी राष्ट्रवादी पार्टी का जिसने एक पल के लिये भी यह ना सोचा कि इससे पार्टी की बदनामी होगी कार्यवाई को रोक दिया जाये। जैसे अन्य पार्टीयाँ करती है। चूँकि आपके अनुसार पुलिस , NIA, ATS सब मोदी जी की है, मोदी के कहने पर कार्य करती है, इसका मतलब यह 11 ISI के कथित जासूसों को मोदी जी ने ही पकड़वाया है। अत: ऐसे प्रधानमंत्री का शत् शत् मनन जिनके लिये देश प्रथम है, बाकी सब बाद में। इसे ही तो कहते हैं एक राष्ट्रवादी सरकार का राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री। यह घटना सबुत है इसका।

और हाँ वह जो 11 पकड़े गये हैं, वह सब हिंदू हैं शायद। और अगर वह आरोपी साबित होते हैं तो उन्हें फाँसी पर लटकाया जाये। उनका समर्थन और बचाव करने एक भी हिंदू नहीं आयेगा। उसके अंतिम यात्रा में याकूब जैसी भीड़ नहीं दिखेगी। उनके लिये हम रात को 3 बजे न्यायालय नहीं खुलवायेंगे।
कारण हमारे लिये आतंकी सिर्फ आतंकी है।
उसका मददगार भी गद्दार है। हमारे लिये मुल्क पहले, बाकी सब बाद में।
यह फर्क है हममें और आप में,
यह फर्क बना रहना चाहीये।

और कोई सवाल?

Monday, September 19, 2016

उरी और पठानकोट विश्लेषण : भारत और पाकिस्तान

यदि सच पढ़ने सुनने की क्षमता हो तभी पढ़े,

हाल ही में उरी में आतंकी/पाकिस्तानी हमला हुआ, हमारी सेना के 18 जवान शहीद हो गए करीब 30 अस्पताल में घायल पड़े है, हम जैसो की देशभक्ति, गुस्सा और वीरता संभाले नही संभल रही, सबसे पहले तो शहीदों को श्रद्धांजलि देना चाहूंगा साथ ही इस हमले पर कुछ बात भी करना चाहूंगा हो सकता है बहुत से लोगो को हजम ना हो,

हमला कैसे हुआ : विभिन्न समाचार माध्यमो से प्राप्त जानकारी के हिसाब से हमलावर पीछे की तरफ टूटी हुई दीवार से सुबह के समय  अंदर दाखिल हुए, घूमे मुआयना किया तब हमला किया,

गलती किसकी : मुझे अपनी सेनाओं की क्षमता पर कोई शक नही है लेकिन कुछ सवाल जरूर है शायद आपके मन में भी आए हो, या हो सकता है सेना के सम्मान के कारण आप इस बारे में सोच ना पाए हो,  मारे गए चार हमलावरों में से तीन पाकिस्तानी है एयर एक भारतीय कश्मीरी, तीन घुसपैठिये पाकिस्तान से आसानी से भारत की सीमा में आते है यहाँ अपने दोस्त से मिलते है लेकिन हमारी सेना/ पुलिस/ लोकल इंटेलिजेंस सब फेल, कोई भी इन्हें पकड़ नही पाता, अब ये सेना कैम्प का मुआयना करके आते है लेकिन कैम्प की सुरक्षा में मुस्तैद जवानों को कोई खबर नही, उन्होंने "टूटी हुई दीवार" का पता लगाया हुआ और हमले की तैयारी की, यहीं एक और सवाल उठता है क्या हमारे जवानों को अपने ही कैंप की टूटी हुई दीवार नही दिखाई दी कभी, यदि दिकही दी तो क्या ये बात अधिकारियो तक पहुंची, यदि पहुंची तो अधिकारियो ने क्या दीवार बनवाने का प्रयास किया, यदि किया तो दिवार बन क्यों नही पाई, चलो कोई बात नही हो सकता है मंत्रालय ने दिवार बनाने के लिए पैसा ना दिया हो या कोई अड़चन लगा दी हो, लेकिन क्या तब तक कोई तारबंदी, अस्थाई बंकर वहां नही बनाया जा सकता था, यदि बना था तो उस पर तैनात जवान कहाँ था हमले के वक्त, तो सीधी साफ़ बात तो ये है कि हमला तो हमारी भगवान् समान पूजनीय सेना की अपनी कमियों से हुआ है लेकिन अब चुप बैठना कायरता ही है, क्या हमारी सेना/अर्धसैनिक बल अपने कैंप की भी रक्षा नही कर सकते, चलो आत्मघाती हमला था, हमारी सेना ने 17 सैनिकों की कीमत पर 4 सुवरो को मार लिया, और हाँ केवल उरी का ही नही पठानकोट में भी ये ही हुआ था लेकिन अब क्या....

सरकार ने क्या किया : हमारे मंत्री महोदय मौके पर घूम कर आए, हर छोटे बड़े नेता मंत्री ने हमले की निंदा का अपना काम पूरा किया, बड़े मंत्री साहब ने मीटिंग बुलाई चाय पी समोसे खाए, एक और रटा रटाया बयान आया हमले में पडोसी पाकिस्तान का हाथ है, दोषियों को बख्शा नही जाएगा, जनता का गुस्सा शांत होते नही दिखा एक और मीटिंग बुलाई फिर चाय समोसे इस बार मिठाई भी होगी, अब सबूत भी मिलने का दावा किया अब तो लग रहा है अब तो सबूत मिल ही गये है मीटिंग के बाद तुरंत पाकिस्तान बर्बाद हो जाएगा, सेना की कार्यवाही शुरू हो जाएगी, लेकिन होगा क्या सबूत सौंपे जाएंगे पाकिस्तानी उनका आचार डालेंगे बिरयानी में मिला कर खा जाएंगे, सबूत कम पड गये अगली बार ज्यादा भेजना का लव लैटर आएगा, सरकार कुछ नही कर रही चलो हम ही कुछ करेंगे, आओ मिलकर जोर लगा कर लिखते है पकिस्तान मुर्दाबाद, और हो जाएगा पाकिस्तान मुर्दाबाद, एक मोमबत्ती वाली फोटो डाउनलोड करके लगाते है,

तो क्या कर सकते है : तो भैया हम ये कर सकते है पर दबाव बनाओ की हमे नही चाइये 15 लाख, हमे नही चाहिए बुलेट ट्रेन, सबसे पहले हमें शांति चाहिए, शांति कैसे आएगी रोज रोज के इस नाटक से मुक्ति मिलेगी तब पड़ेगी शांति, तो भैया यदि शांति युद्ध में पाकिस्तान को बरबाद करके ही मिल सकती है तो युद्ध हो जाने दो सामने से, कम से हम हमारे जवान सोते हुए तो नही मारे जाएंगे, जब मरना ही तो तो सोते हुए मरने से अच्छा है युद्ध के मैदान में लड़ते हुए शहीद हो, कम से कम दुनिया इज्जत तो रहेगी, सर उठा कर कह तो सकेंगे की युद्ध के मैदान में लड़ते हुए शहीद हुए है, "भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है यदि शाँति का मार्ग युद्ध से होकर जाता है तो युद्ध हो जाने दो" जरुरी नही युद्ध आज और अभी हो, जैसे मीडिया कहे ऐसे हो लेकिन जरुरी है दुश्मन को सबक सिखाना, बस ध्यान रहे जो शहीद हुए है उन्होंने देश के लिए ही जान दी है तो देश का भी कुछ कर्तव्य है उनके प्रति,

क्या मिलेगा युद्ध से : मैं भी जानता हूँ युद्ध होगा तो भरी नुकसान होगा, ना जाने कितने वीर सैनिक शहीद होंगे, गाँव के गाँव बर्बाद होंगे, कई शहर भी नष्ट हो सकते है, सरकार की माली हालात खराब हो जाएगी, उद्योग ठप हो जाएंगे, लेकिन जो मिलेगा वो होगा सेना का खोया हुआ आत्मसम्मान, चिरपरिचित दुश्मन से मुक्ति, रोज रोज की तू तू मैं मैं से मुक्ति , तब हम दोबारा अपनी अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा कर सकते है उद्योग चला सकते है खुद को सुरक्षित महसूस कर सकते है, हमारी सेनाओं और हथियारों को जंग लग चुका है जरूरत है उन्हें खोई हुई धार वापस लौटाने की,

तो माननीय प्रधानमंत्री प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी जी, अब ये लव लैटर लिखना बंद किया जाए, सेना को खोया आत्मसम्मान लौटाया जाए, दुश्मन ने सोये हुए सैनिकों को घर में घुस कर मारा है अब हमारी बारी है दुश्मन को उस से घर में घुस कर मारा जाए, और हाँ यदि आपसे नही होता तो तीनों सेनाओं के सरताज राष्ट्रपति जी बैठे ही उन्हें सौंप दिया जाए राज काज, यदि उनसे भी ना होता हो तो तैयार रहो तख्तापलट के लिए, आक्रोश में कब सेनाए आदेश का इंतज़ार करना बंद कर देंगी समझ भी नही पाओगे

Wednesday, September 7, 2016

मलाला और आतंकवादियों के मानवाधिकार

मलाला युसूफजई... वही लड़की जिसने शिक्षा पाने के अपने हक के लिये आवाज उठाई थी...बदले में आतंकवादियों ने उस पर गोली चला दी... गोली लगने के बावजूद वो बच निकली और रातोंरात स्टार बन गयी।

दुनिया भर की मीडिया ने उसे सर पर बैठाया, भारतीय मीडिया तो चार कदम आगे रही।

जानतें हैं उसके स्टार बनने की वजह?

अपने हक के लिये आवाज उठाना?

नहीं...बिल्कुल नहीं...हक के लिये तो हर दूसरा आदमी उठाता है...वजह थी गोली लगना और फिर बच निकलना।

मलाला आज जहाँ भी हैं खुद की नहीं आतंकवादियों की वजह से...मलाला के शोहरत की बुलंदियों पर  पहुँचने में आतंकवादियों का योगदान है...फिर वो जहाँ भी गयी, जिधर भी लेक्चर दिये, आतंकवाद के खिलाफ बोलीं वो सुरक्षा के बड़े घेरे में।

आलोचना नहीं कर रहा बता रहा की जिस तरह से मलाला को यूथ आईकन की तरह पेश किया गया वो बिल्कुल ही बचकाना था। मलाला ने ऐसा कोई तोप नहीं चलाया था ।

उनसे ज्यादा प्रतिभावान लोग पड़े हैं जो अपनी काबिलियत भर के दम पर विश्व को एक नई दिशा देने की क्षमता रखतें हैं...पर उनको गोलियां नहीं पड़ी इस वजह से कोई पूछता नही।
मलाला को गोली लगी इसलिये वो दुनियाभर के लिये क्रांतिकारी हो गयीं।

आज यही क्रांतिकारी कश्मीर मुद्दे पर आतंकवादियों के मानवाधिकार के लिये भाषण दे रही हैं...उन्ही मजहबी कट्टरपंथियों के लिये जिन्होंने गोली मारी थी...हमदर्दी छलक ही गयी।
किसी को भी अपना आदर्श बनाने  से पहले उसके बारे में बड़े अच्छे से सोच समझ लेना चाहिये..वरना यूं ही हड़बड़ी में गड़बड़ी होती है....मलाला ने ऐसा कोई योगदान नहीं दिया जिससे उन्हें लोगो के आदर्श के रूप में रिप्रेजेंट किया जाये.. आदर्श बनते हैं अपने कर्मो से , खुद के साथ हुये हादसों से नहीं।

बाकी मैं मलाला को आतंकवादियों के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाली थोड़ी कम कट्टरपंथी मानता हूँ।