एक आम लेकिन खास भारतीय नागरिक के अंतर्मन से निकले शब्द है, किसी अख़बार या टीवी शो पर नही मिलेंगे
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Tuesday, July 16, 2019
झारखंड : ऋचा भारती बनाम मजिस्ट्रेट मनीष कुमार सिंह
Thursday, August 10, 2017
चोटी और डोकलाम
अभी अभी कहीं पढ़ा कि चीन कह रहा है अभी भी भारत के ५३ सैनिक और एक बुल्डोजर डोकलाम में चीन की सीमा में घुसे हुए है,
दरसअल जब से भारत चीन का डोकलाम में ये सीमा विवाद मीडिया में आया है तभी से सोच रहा हूँ आखिर ये माजरा क्या है, फिर मेरे पांचवी पास से तेज दिमाग ने जोड़ घटा गुणा भाग कर के ये हिसाब लगाया है कि ये सब मिलकर हमे पागल बना रहे है, हम भी डिप्लोमची है कोई ऐसे वैसे नही तो जो बात इस हिसाब लगाने से सामने आई है वो ये है कि हमारे सडजी ने अपने ही कुछ असम मणिपुर के भाइयो और कुछ नेपाली साबजी को पकड़ कर फोटो शूट कराया था इस बार दिल्ली युद्ध के लिए तैयार है, अब कुछ आपियो ने जोश जोश में वो फोटो फेसबुक ट्विटर पर अपनी दहाड़ी पूरी करने के मकसद से पोस्ट कर दिया,
यहां अमित शाह के चेले कुछ भक्त फिराक में बैठे थे कि कब सडजी कुछ बोले हम सडजी को ट्रोल करे, वैसे भी जब से कपिल मिश्रा ने रायते में फेवीक्विक मिलाया है तब से सोशल मीडिया में कच्चे माल की भारी कमी बताई जा रही है, इधर मोदी नाम पर बने के एक फर्जी एकाउंट ने फोटोशॉप करके सड़ जी को सेना की वर्दी पहना कर फोटो ट्वीट कर दी, मजे मजे में भक्तों की टोली ने फोटो वायरल कर दी,
वहाँ शी जिनपिंग फोटो देख कर सदमे में आ गया कि ये दिल्ली किससे युद्ध को तैयार है और ये इसने हमारे चीनी भाइयो को क्यो कब्जे में ले लिया, वहाँ चीन ने भी अपनी तैयारिया शुरू कर दी वे भी चुपचाप डोकलाम के रास्ते भारत मे घुसने की तैयारी कर रहे थे अपने भाइयों को बचाने के लिए, वहाँ भारत की सेना पहले ही तैयार खड़ी मिली अपने ट्रक लेकर, अब जिस खेत मे चीन और भारत के सैनिकों की मुलाकात हुई उसका पता ना चीन के सैनिकों को है ना भारत के सैनिको को की ये है किसका, जिसका वो खेत है उसे कोई पूछ नही रहा दोनो अपना बता रहे है,
जब से वो एक सैनिक ने दाल रोटी वाली वीडियो बना कर डाली तब से हर कोई वीडियो बनाने में लगा हुआ है, अपने सैनिकों ने बन्दूक की जगह अपने मोबाइल निकाल कर वीडियो बनानी शुरू की और फेसबुक वाट्सएप्प पर घूमने के लिए छोड़ दी,
अब यहाँ ठहरे ५६ इंची छाती वाले बोले चीन वाले कुल ५६ इंच के नही है बोले क्यो भाइयो है कि नही...
भीड़ का क्या है भीड़ ने क्या सुना क्या समझा ये तो वो ही जाने लेकिन भीड़ की आवाज से साहब समझ गए १०० करोड़ मेरे साथ है बाकी २५ करोड़ अभी डर के साये में है और हाँ जो ३-४ करोड़ बचे वे कांग्रेसी है उनकी अभी कहीं कोई गिनती नही है, साहब ने भी सेना को फरमान जारी कर दिया कि अब पीछे नही हटना है और राजनाथ को बोला कि एक कड़ी निंदा वाला ट्वीट टाइप करके ड्राफ्ट में रखो यदि कुछ गड़बड़ हो तो तुरंत कड़ी निंदा कर देना,
इधर अपने सडजी परेशान की मैं तो डेंगू मछरों से युद्ध करने निकला था ये अनपढ़ आपिये मेरा जनाजा ही निकाल कर मानेंगे, खैर डैमेज कंट्रोल के लिए सडजी ने आनन फानन में नई रणनीति बनाई कि कैसे भी करके पब्लिक का ध्यान उस मुद्दे से हटाया जाए कहीं चीन वाले सच मे मुझे ना उड़ा दे, इस से पहले की सडजी चप्पल या चांटा लगवाते हमारे पप्पू भी साहब ने पत्थर फेंकवा लिया, सड़ जी ने मन ही मन पप्पू को गाली देते हुए आपियो की आपात बैठक बुलाई, पिंचर वालो का काम तो जोरो शोरो से चल रहा है लेकिन आजकल बाल काटने के धंधे में लगे लोग बेरोजगार है जिसे देखो दो मीटर की दाढ़ी बढ़ाए देवदास बना घूम रहा, सड़ जी के आई आई टी वाले दिमाग में तुरंत बेरोजगार नाईयो को रोजगार देने का खयाल आया और उन्हें एनसीआर में चोटी काटने का ठेका दे दिया,
अब हमारी अबला माताओ बहनों ने भी योजना का पूरा लाभ उठाया जिन्हें कोई बाल छोटे नही करने दे रहा थ खुद ही उड़ा कर चोटी गैंग के नाम लगाना शुरू कर दिया, इधर भारत की मीडिया भूखी बैठी थी कि कब से कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नही आई , इस ब्रेकिंग न्यूज़ के आते ही मीडिया चीन और देशभक्ति को भूल चोटी गैंग का पर्दाफाश करने में जुट गई,
वहाँ हमारे जिनपिंग भाईसाहब परेशान है कि यहां मैं रोज युद्ध की धमकी दे रहा हूँ उधर कोई सीरियस नही ले रहा, आज थक हारकर हाथ जोड़कर विनती की है कि भाई साहब यदि चोटी गैंग से फुरसत मिल गयी हो तो ये भी देख लो अब तक मैं पूरे २४१५७८ बार युद्ध की धमकी दे चुका हूँ अब तो सीरियस हो जाओ
नोट: ये केवल एक हास्य व्यंग्य है कोई अपनी राजनैतिक भावना बेन को आहत ना करे,
आपका पगला पंडित
अतुल शर्मा गुड्डू
रासना वाला
Wednesday, August 9, 2017
काकोरी कांड या भारत छोड़ो आंदोलन
#काकोरीकाण्ड
अंग्रेजी सीनाजोरी को, उत्तर था वो जी दारी का...
कुछ मतवाले जांबाजों ने, था काण्ड किया काकोरी का...
#वंदेमातरम...
ये कहानी उनके लिए जिन्हें लगता है आजादी किसी गाँधी या नेहरू ने दिलाई थी
एक गाँव में एक बहुत पुराना विराट वृक्ष था उसमे तरह तरह के विषैले सर्प रहते थे जो वहां से निकलने वाले पथिकों को काट लिया करते थे गाँव के लोग परेशान रहने लग गए क्योंकि उस गाँव का मुख्य मार्ग वही था
फिर एक दिन पंचायत में तय हुआ की इस वृक्ष को काट दिया जाए और फिर शुरू हुआ गाँव को उस वृक्ष से आज़ाद कराने का आंदोलन।
उस वृक्ष को काटने जो भी व्यक्ति जाता कुल्हाड़ी से एक दो वार करता तब तक उसे सर्प काट लेता और वो मर जाता
लेकिन गाँव वालों ने हिम्मत नही हारी बीसों साल सतत प्रयास होता रहा कई लोग मौत की नींद सोते रहे परंतु कुल्हाड़ियों के निरंतर वार से वह वृक्ष इतना कमजोर हो गया की बस आज गिरा या कल गिरा लेकिन गाँव वाले इस बात से अनभिज्ञ थे क्योंकि वृक्ष झाड़ियों से घिरा हुआ था
एक दिन गाँव में दो कौवे आये और उसी वृक्ष में बैठ कर जोर से काँव काँव करने लग गए चूंकि पेड़ कमजोर हो गया था जिसके कारण वह उसी समय गिर गया और गाँव के अनपढ़ भोले भाले लोग उन कौवों को भगवान का भेजा हुआ दूत समझ बैठे और पेड़ गिराने का सारा श्रेय अपनी जान देने वाले उन शहीदों को न देकर उन दोनों कौवो को देने लग गए।
इस कहानी को #गांधी #नेहरू से जोड़कर अवश्य देखें।
आने वाली पीढियां उतना ही जान पाती है जितना उन्हें बताया जाता है, हमे दिन रात चारो तरफ गाँधी नेहरू पढ़ाए दिखाए गए तो उन्हें ही आजादी के रहनुमा समझ बैठे, जो अपना सबकुछ न्योछावर कर गए उनकी कोई बात भी नही करता क्योंकि उन्हें इतिहास के पन्नो से भी गायब कर दिया गया, पूरा दिन बीतने पर काकोरी वालो को याद करने वाले वाले गिनती के थे जिन्हें लोग संघी भाजपा वाले या भक्त कहते है बाकी सब उन आंदोलनों की बरसी मनाते रहे जो हर बार बीच मझधार में छोड़ कर रास्ते बदल गए,
चलो मान लिया चरखे ने ही उन सारे अंग्रेजो को पटका था,
पर हमको दे दो वो पावन रस्सी जिस पर बिस्मिल लटका था,
भलो हो गाँधी की धोती तुम्हारे लिए गहना था,
पर हमको दे दो वो फंदा जिसे भगत सिंह ने पहना था,
चलो आजादी के महायुद्ध में सारा कार्य तुम्हारा था,
पर हमको दे दो वो गोली जिसे आजाद ने खुद को मारा था,
हम मान चुके की नेहरू ही भारत आजाद कराया था,
पर हमें सुना दो फिर वो धुन जिसे राजगुरु ने गाया था,
सोते सोते एक गौरवमयी श्रद्धांजलि उन शहीदों के नाम जिनके नाम भी मिटा दिए गए,
#काकोरी
आपका पगला पंडित
अतुल शर्मा गुड्डू
रासना वाला
Thursday, June 22, 2017
आखिर क्यों जल रहा है दार्जिलिंग .....
...तो उन्हें 'गोरखालैंड' दे क्यों नहीं देते?
दार्जिलिंग जल रहा है, देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों से प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने पहुंचे पर्यटक भूख से मर रहे हैं, आंदोलन करने वाले लोगों का नेतृत्व कर रहे नेताओं के घर छापे पड़ रहे हैं, इन सबकी वजह क्या है? क्या लोगों को हो रही परेशानी के लिए एक आंदोलन जिम्मेदार है? क्या आंदोलन कर रहे लोगों की मांग नाजायज है? आइए, इतिहास से वर्तमान तक के हालात का विश्लेषण करते हुए दार्जिलिंग में चल रहे आंदोलन को समझने की कोशिश करते हैं।
देश में कई बार भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन हुआ है। 1960 से इसकी शुरुआत हुई, जहां मराठी बोलने वालों के लिए महाराष्ट्र और गुजराती बोलने वालों के लिए गुजरात बना। इसके बाद झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना जैसे राज्यों का गठन हुआ। वहीं दार्जिलिंग को सिक्किम में विलय करने की मांग वर्षों पुरानी है। इतिहास का अध्ययन करने पर पता लगता है कि दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र सिक्किम का ही हिस्सा रहा है। 1841 साल तक दार्जिलिंग सिक्किम को लगान देता था। बाद में अंग्रेजों ने दार्जिलिंग को सिक्किम से अलग कर दिया। तभी से दार्जिलिंग पश्चिम बंगाल का हिस्सा हो गया। भारत में राज्यों का गठन क्षेत्र की संस्कृति (खासकर भाषाई संस्कृति) के आधार पर होता आया है लेकिन दार्जिलिंग क्षेत्र, जो कि एक पहाड़ी क्षेत्र है, उसे पश्चिम बंगाल के साथ मिलाकर एक ओर जहां गोरखाई पहाड़ी संस्कृति को खत्म किया जा रहा है, वहीं एक दूसरी भाषा आधारित संस्कृति को जबरदस्ती थोपने की भी कोशिश की जा रही है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा 10वीं तक की शिक्षा में बांग्ला को अनिवार्य कर दिया जाना, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
1865 में जब अंग्रेजों ने दार्जिलिंग में चाय का बगान शुरू किया तो बड़ी संख्या में मजदूर यहां काम करने आए। उस समय किसी तरह की अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा नहीं थी, लिहाजा ये लोग खुद को गोरखा किंग के अधीन मानते थे। इस इलाके को वे अपनी जमीन मानते थे। लेकिन आजादी के बाद भारत ने नेपाल के साथ शांति और दोस्ती के लिए 1950 का समझौता किया। सीमा विभाजन के बाद यह हिस्सा भारत में आ गया। उसके बाद से ये लोग लगातार एक अलग राज्य बनाने की मांग करते आ रहे हैं। बंगाली और गोरखा मूल के लोग सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तौर पर एक दूसरे से अलग हैं, जिस वजह से इस आंदोलन को ज्यादा बल मिला।
गोरखालैंड की मांग की शुरुआत सबसे पहले गोरखा नैशनल लिबरेशन फ्रंट के सुभाष घिसिंग ने की थी। पहली बार 5 अप्रैल 1980 को घिसिंग ने ही ‘गोरखालैंड’ नाम दिया था। इसके बाद पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) बनाने पर राजी हुई। घिसिंग की लीडरशिप में अगले 20 साल तक वहां शांति बनी रही। लेकिन बिमल गुरुंग के उभरने के बाद हालात बदतर हो गए। गोरखा नैशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर विमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की नींव रखी और गोरखालैंड की मांग फिर तेज हो गई। जिस हिस्से को लेकर गोरखालैंड बनाने की मांग की जा रही है उसका कुल एरिया 6246 किलोमीटर का है। इसमें बनारहाट, भक्तिनगर, बिरपारा, चाल्सा, दार्जिलिंग, जयगांव, कालचीनी, कलिम्पोंग, कुमारग्राम, कार्सेंग, मदारीहाट, मालबाजार, मिरिक और नागराकाटा शामिल हैं।
जिस क्षेत्र को गोरखालैंड बनाने की मांग की जा रही है, उसकी संस्कृति एक जैसी है। वहां के लोग गोरखा-नेपाली भाषा बोलते हैं। आंदोलनकारी चाहते हैं कि केन्द्र सरकार गोरखालैंड के नाम से एक अलग राज्य बनाकर उन्हें उनकी संस्कृति को सुरक्षित रखने का मौका दे, लेकिन राजनीति के साथ-साथ ‘गोरखालैंड’ के नेपाल के साथ मिल जाने का डर उन्हें अलग राज्य नहीं दे पा रहा है। इसके साथ-साथ एक सवाल यह भी है कि जहां के लोग भारतीय सीमा पर अपने शौर्य के लिए किसी परिचय के मोहताज नहीं, उस क्षेत्र के लोगों पर अपने देश का साथ छोड़ देने को लेकर शंका करना क्या उचित है? क्या उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे अपनी संस्कृति का संरक्षण कर सकें? क्या ममता बनर्जी द्वारा दसवीं तक की पढ़ाई में बांग्ला को अनिवार्य करना ‘भाषाई साम्राज्यवाद’ नहीं है? नई भाषा सीखना कहीं से भी गलत नहीं है लेकिन किसी भाषा को जबरदस्ती थोपना पूरी तरह से गलत है। जो इन इलाकों के मामलों को देखने वाले गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) का प्रभाव इस बात को साबित करता है कि वहां के निवासी, वहां की जनता जीजेएम की मांग का समर्थन करती है। क्या आम जनता की इच्छा की अनदेखी करना ठीक है?
हो सकता है आप कहें कि ऐसा ही एक आंदोलन तो जम्मू-कश्मीर में भी चल रहा है, तो उसका समर्थन क्यों नहीं किया जा सकता। लेकिन घाटी के अलगाववादी आंदोलन की तुलना गोरखालैंड के आंदोलन से नहीं की जा सकती क्योंकि घाटी में आंदोलन करने वाले अलगाववादी पाकिस्तान का झंडा लहराते हैं, पाकिस्तान की जीत पर उसे बधाई देते हैं लेकिन जरा इस तस्वीर को देखिए, गोरखालैंड की मांग कर रहे आंदोलनकारी भारत के राष्ट्रीय ध्वज को लेकर सड़कों पर निकले हैं। वे बस इतना ही चाहते हैं कि केन्द्र सरकार के थोड़े से सहयोग से उनकी संस्कृति बच जाए, उनका मूल अस्तित्व बच जाए।
जीटीए द्वारा बुलाए गए बंद के दौरान हो रही हिंसा को कड़ाई से कुचलना चाहिए, दोषियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन साहब, यह कहां का न्याय है कि कोई अपनी संस्कृति को बचाने के लिए एक अलग प्रदेश की मांग करते हुए बंद बुलाए, आम जनता उसका साथ दे तो उनपर प्रदेश सरकार गोलियां चलवाती है लेकिन अगर कश्मीर में कोई पड़ोसी मुल्क का झंडा लेकर हमारी सेना के जवानों पर पत्थर बरसाए, देश तोड़ने की बात करे तो उनपर गोलियां चलाने की मांग करने वालों को ‘मानवता का हत्यारा’ करार दिया जाता है। इसकी वजह क्या है?
Sunday, February 12, 2017
ISI के जासूस और हम
समुदाय विशेष वाले आकर पुछते हैं कि मध्य प्रदेश में 11 ISI के जासूस पकड़े गये उसपर कुछ कहो,लिखो। दरअसल वह कहना चाहते थे जिस भाजपा को आप राष्ट्रवादी बताते हो उसके ही पार्टी के नेता के रिश्तेदार इसमें लिप्त है,इसलिये क्या आप इसके लिये भाजपा को ISI का एजेंट मानते हो?
मेरे प्यारे मित्र, आपका और आपके जैसे तमाम दोगली सोच वालों की दोगलीयत को सर्वप्रथम दंडवत प्रणाम। कल तक मोदी को शांतीदुत विरोधी और हिटलर बताने के लिये आप जिस पुलिस, ATS, NIA, Intelligence, फौज सबको मोदी के हाथों बिक गयी बताते थे आज उसके ही द्वारा पकड़े गये इन 11 लोगों के लिये आप इन संस्थाओं को शाबाशी दे रहे हैं। आप की इस मोदीविरोध में दोनों तरफ से खाना खा सकने वाली क्षमता का मैं कायल हो गया हूँ।
वैसे शाबाशी तो देनी ही होगी उस म.प्र. पुलिस को जिसे कल तक आप मुख्यमन्त्री शिवाराज सिंह की पुलिस कहते थे और उसके द्वारा भोपाल जेल से भागे गये आतंकीयों को ठोकने की वजह से उसे फेक एनकांउटर कह रहे थे। दरअसल दिक्कत यह थी कि वह भाजपा की सरकार थी और भागने वाले आपके समुदाय के थे। पर चलो आज आपने म.प्र पुलिस कि इस 11 लोगों की गिरफ्तारी पर भरोसा किया है तो यह प्रमाणित होता है कि म.प्र. पुलिस ईमानदार है, और वह एनकांउटर फेक नहीं था।
फिर मैं शाबासी दूँगा ATS को, जिसका इन्हें पकड़ने में योगदान है। वही ATS जिसे कल तक आप कल तक इशरत जहाँ का हत्यारा कहते थे, और मोदी के हाथों खेलने वाले संस्थान बताते थे। पर अब चूंकि ATS ने इन 11 लोगों को पकड़ा है और आप पुरी तरह आश्वस्त हैं कि यह 11 ISI के जासूस थे तो आप इस बात की पुष्टि करते हैं कि ATS जो करती है सही करती है। ATS ने इशरत को मारा बिलकुल सही किया। पर आप कल तक विरोध सिर्फ इसलिये करते रहे कारण इशरत आपके समुदाय की थी।
फिर शाबाशी देते हैं NIA तथा अन्य सुरक्षा एजेंसीयों का भी जिसे कल तक आप हर गिरफ्तारी के बाद समुदाय विशेष विरोधी बताते थे। और इनके द्वारा की गयी हर गिरफ्तारी में गिरफ्तार लोगों को मासुम बताते थे, कारण वह आपके समुदाय के होते थे। पर खैर आज आप जब NIA कि इस 11 गिरफ्तारीयों का स्वागत कर रहे हैं तो मैं मान लेता हूँ कि पहले की गयी सभी गिरफ्तारीयों को भी आप सही मानते हो।
और अंत में हो सकता है फौज का भी योगदान रहा हो,वही फौज जिसे कल तक आप हत्यारा कहते थे कश्मीरी आतंकीयों को मारने पर, वही फौज जिसके द्वारा कि गयी सर्जिकल स्ट्राइक को आप फेक बताते थे,सबुत माँगते थे। पर आज आपका अचानक फौज पर जागा भरोसा बताता है कि आप फौज की अब तक की सारी कार्यवाई के साथ खड़े हैं,और उसे सही मानते हैं।
और पुरे देश की ओर से शाबाशी दूँगा भाजपा जैसी राष्ट्रवादी पार्टी का जिसने एक पल के लिये भी यह ना सोचा कि इससे पार्टी की बदनामी होगी कार्यवाई को रोक दिया जाये। जैसे अन्य पार्टीयाँ करती है। चूँकि आपके अनुसार पुलिस , NIA, ATS सब मोदी जी की है, मोदी के कहने पर कार्य करती है, इसका मतलब यह 11 ISI के कथित जासूसों को मोदी जी ने ही पकड़वाया है। अत: ऐसे प्रधानमंत्री का शत् शत् मनन जिनके लिये देश प्रथम है, बाकी सब बाद में। इसे ही तो कहते हैं एक राष्ट्रवादी सरकार का राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री। यह घटना सबुत है इसका।
और हाँ वह जो 11 पकड़े गये हैं, वह सब हिंदू हैं शायद। और अगर वह आरोपी साबित होते हैं तो उन्हें फाँसी पर लटकाया जाये। उनका समर्थन और बचाव करने एक भी हिंदू नहीं आयेगा। उसके अंतिम यात्रा में याकूब जैसी भीड़ नहीं दिखेगी। उनके लिये हम रात को 3 बजे न्यायालय नहीं खुलवायेंगे।
कारण हमारे लिये आतंकी सिर्फ आतंकी है।
उसका मददगार भी गद्दार है। हमारे लिये मुल्क पहले, बाकी सब बाद में।
यह फर्क है हममें और आप में,
यह फर्क बना रहना चाहीये।
और कोई सवाल?
Sunday, December 18, 2016
हिंदुत्व और हम ...
मैं बचपन से कट्टर हिन्दू नहीं था और मेरे माता पिता ने मुझे कट्टरवाद तो क्या,कभी हिन्दुवाद भी नहीं सिखाया ,
मुझे बचपन से यह रटाया गया कि
"हिन्दू-मुस्लिम" भाई भाई,
मुझे बचपन से ही क्लास 10 तक सेकुलरिज्म का पूरा डोज दिया जाता रहा है,
याद है मुझे अभी भी कि 10 वीं कक्षा के History बुक में मुझे यह रटाया जाता कि -"
अकबर महान था, हुमायूं महान था, औरंगजेब वीर था" इत्यादि
मेरी अंतरात्मा ने कभी मुझे दिल से सेक्युलरिज़्म की दलदल में नहीं जाने दिया ,
जब मैंने दुनिया को जानना शुरू किया समझना शुरू किया
अभी मैंने देखा कि बहुत से सेकुलर पत्रकार ब्लॉग लिखकर जी न्यूज़ की निंदा कर रहे हैं ...लेकिन निंदा क्यों कर रहे हैं क्योंकि जी न्यूज बंगाल में मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर किये जा रहे अत्याचारों को दिखा रहा है इसलिए उन्हें तकलीफ और पीडा हो रही है ।
2002 के गुजरात दंगों के दौरान (और 2014 चुनाव तक भी ) हर एक मीडिया हर एक अखबार दंगों को खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता था रवीश कुमार वाले एनडीटीवी ने यह दिखाया था कि हिंदुओं की भीड़ में एक मुस्लिम गर्भवती महिला का तलवार से पेट चीरकर और उसका बच्चा निकालकर आग में फेंक दिया जांच में रिपोर्ट एकदम झूठी पाई गई तब किसी भी कांग्रेसी नेता ने या किसी भी सेकुलर सूअर पत्रकार ने यह नहीं कहा था कि NDTV और कोबरा पोस्ट तहलका जैसे पोर्टल सांप्रदायिक सौहार्द को खराब कर रहे हैं ।
लेकिन जब मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार की खबर दिखाई जाती है तब ही ये सेकुलर चिल्लाने लगते हैं देश का सांप्रदायिक माहौल खराब किया जा रहा है ।यानी मीडिया के कुछ वर्गों, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की नजर में हिंदुस्तान में मुसलमानों द्वारा दंगा करना दंगा फैलाना मंदिरों पर और हिंदुओं की संपत्ति पर हमला करना जायज है, पिछले कुछ दिनों में जिस तरह बंगाल में हालात बाद से बदतर हुए है ये जानता हर कोई है दबी जबान में कहता भी हर कोई है लेकिन सेक्युलरिज़्म का कीड़ा इस पीड़ा को कभी खुलकर बहार नही आने देता,
इसका कारण भी लगभग है कोई जानता है भले ही साबके सामने स्वीकार करने या कहने में झिझक होती हो, लेकिन चलो फिर भी मैं आज फिर बता देता हूँ ये साम्प्रदायिकता कोई नही चीज नही है लेकिन धरती के किसी भी कोने में चले जाओ, जहाँ भी साम्प्रदायिक दंगे फसाद हो उनमे एक दोनों पक्षो पर गौर करोगे तो पाओगे की 99% मामलो में एक पक्ष हमेशा मुसलमान होगा, फिर दूसरा चाहे कोई भी हो.... दूसरा पक्ष हिन्दू, सिख्स, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी कोई भी हो सकता है....
दुनिया भर के मुसलमानों को दरकिनार कर यदि हम ये सोच भी बनाने के प्रयास करे की भारत का मुसलमान ऐसा नही है, भारतीय मुसलमान देशप्रेमी और भाईचारे से रहने वाला है तो भी मन ये मानने कोई तैयार ही नही होता, क्योंकि भारत का इतिहास भूगोल वर्तमान सबकुछ ये ही कहता है कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान है ना वो भारतीय है ना ब्रिटिश न अफ़्रीकी .....
इसलिए मेरे मन में एक सवाल आया की यदि मुसलमान सच मे भाईचारे के साथ रहते हैं तो फिर पाकिस्तान और बांग्लादेश की जरुरत ही क्यों पड़ी? और अब जम्मू कश्मीर, केरल, बंगाल, उत्तरप्रदेश किस राह पर जा रहे है और उसकी वजह क्या है ये प्रश्न तब तक अनुत्तरित रहेगा जब तक हमें झूठा सेकुलरिज्म पढ़ाया जाता रहेगा....
Monday, September 19, 2016
उरी और पठानकोट विश्लेषण : भारत और पाकिस्तान
यदि सच पढ़ने सुनने की क्षमता हो तभी पढ़े,
हाल ही में उरी में आतंकी/पाकिस्तानी हमला हुआ, हमारी सेना के 18 जवान शहीद हो गए करीब 30 अस्पताल में घायल पड़े है, हम जैसो की देशभक्ति, गुस्सा और वीरता संभाले नही संभल रही, सबसे पहले तो शहीदों को श्रद्धांजलि देना चाहूंगा साथ ही इस हमले पर कुछ बात भी करना चाहूंगा हो सकता है बहुत से लोगो को हजम ना हो,
हमला कैसे हुआ : विभिन्न समाचार माध्यमो से प्राप्त जानकारी के हिसाब से हमलावर पीछे की तरफ टूटी हुई दीवार से सुबह के समय अंदर दाखिल हुए, घूमे मुआयना किया तब हमला किया,
गलती किसकी : मुझे अपनी सेनाओं की क्षमता पर कोई शक नही है लेकिन कुछ सवाल जरूर है शायद आपके मन में भी आए हो, या हो सकता है सेना के सम्मान के कारण आप इस बारे में सोच ना पाए हो, मारे गए चार हमलावरों में से तीन पाकिस्तानी है एयर एक भारतीय कश्मीरी, तीन घुसपैठिये पाकिस्तान से आसानी से भारत की सीमा में आते है यहाँ अपने दोस्त से मिलते है लेकिन हमारी सेना/ पुलिस/ लोकल इंटेलिजेंस सब फेल, कोई भी इन्हें पकड़ नही पाता, अब ये सेना कैम्प का मुआयना करके आते है लेकिन कैम्प की सुरक्षा में मुस्तैद जवानों को कोई खबर नही, उन्होंने "टूटी हुई दीवार" का पता लगाया हुआ और हमले की तैयारी की, यहीं एक और सवाल उठता है क्या हमारे जवानों को अपने ही कैंप की टूटी हुई दीवार नही दिखाई दी कभी, यदि दिकही दी तो क्या ये बात अधिकारियो तक पहुंची, यदि पहुंची तो अधिकारियो ने क्या दीवार बनवाने का प्रयास किया, यदि किया तो दिवार बन क्यों नही पाई, चलो कोई बात नही हो सकता है मंत्रालय ने दिवार बनाने के लिए पैसा ना दिया हो या कोई अड़चन लगा दी हो, लेकिन क्या तब तक कोई तारबंदी, अस्थाई बंकर वहां नही बनाया जा सकता था, यदि बना था तो उस पर तैनात जवान कहाँ था हमले के वक्त, तो सीधी साफ़ बात तो ये है कि हमला तो हमारी भगवान् समान पूजनीय सेना की अपनी कमियों से हुआ है लेकिन अब चुप बैठना कायरता ही है, क्या हमारी सेना/अर्धसैनिक बल अपने कैंप की भी रक्षा नही कर सकते, चलो आत्मघाती हमला था, हमारी सेना ने 17 सैनिकों की कीमत पर 4 सुवरो को मार लिया, और हाँ केवल उरी का ही नही पठानकोट में भी ये ही हुआ था लेकिन अब क्या....
सरकार ने क्या किया : हमारे मंत्री महोदय मौके पर घूम कर आए, हर छोटे बड़े नेता मंत्री ने हमले की निंदा का अपना काम पूरा किया, बड़े मंत्री साहब ने मीटिंग बुलाई चाय पी समोसे खाए, एक और रटा रटाया बयान आया हमले में पडोसी पाकिस्तान का हाथ है, दोषियों को बख्शा नही जाएगा, जनता का गुस्सा शांत होते नही दिखा एक और मीटिंग बुलाई फिर चाय समोसे इस बार मिठाई भी होगी, अब सबूत भी मिलने का दावा किया अब तो लग रहा है अब तो सबूत मिल ही गये है मीटिंग के बाद तुरंत पाकिस्तान बर्बाद हो जाएगा, सेना की कार्यवाही शुरू हो जाएगी, लेकिन होगा क्या सबूत सौंपे जाएंगे पाकिस्तानी उनका आचार डालेंगे बिरयानी में मिला कर खा जाएंगे, सबूत कम पड गये अगली बार ज्यादा भेजना का लव लैटर आएगा, सरकार कुछ नही कर रही चलो हम ही कुछ करेंगे, आओ मिलकर जोर लगा कर लिखते है पकिस्तान मुर्दाबाद, और हो जाएगा पाकिस्तान मुर्दाबाद, एक मोमबत्ती वाली फोटो डाउनलोड करके लगाते है,
तो क्या कर सकते है : तो भैया हम ये कर सकते है पर दबाव बनाओ की हमे नही चाइये 15 लाख, हमे नही चाहिए बुलेट ट्रेन, सबसे पहले हमें शांति चाहिए, शांति कैसे आएगी रोज रोज के इस नाटक से मुक्ति मिलेगी तब पड़ेगी शांति, तो भैया यदि शांति युद्ध में पाकिस्तान को बरबाद करके ही मिल सकती है तो युद्ध हो जाने दो सामने से, कम से हम हमारे जवान सोते हुए तो नही मारे जाएंगे, जब मरना ही तो तो सोते हुए मरने से अच्छा है युद्ध के मैदान में लड़ते हुए शहीद हो, कम से कम दुनिया इज्जत तो रहेगी, सर उठा कर कह तो सकेंगे की युद्ध के मैदान में लड़ते हुए शहीद हुए है, "भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है यदि शाँति का मार्ग युद्ध से होकर जाता है तो युद्ध हो जाने दो" जरुरी नही युद्ध आज और अभी हो, जैसे मीडिया कहे ऐसे हो लेकिन जरुरी है दुश्मन को सबक सिखाना, बस ध्यान रहे जो शहीद हुए है उन्होंने देश के लिए ही जान दी है तो देश का भी कुछ कर्तव्य है उनके प्रति,
क्या मिलेगा युद्ध से : मैं भी जानता हूँ युद्ध होगा तो भरी नुकसान होगा, ना जाने कितने वीर सैनिक शहीद होंगे, गाँव के गाँव बर्बाद होंगे, कई शहर भी नष्ट हो सकते है, सरकार की माली हालात खराब हो जाएगी, उद्योग ठप हो जाएंगे, लेकिन जो मिलेगा वो होगा सेना का खोया हुआ आत्मसम्मान, चिरपरिचित दुश्मन से मुक्ति, रोज रोज की तू तू मैं मैं से मुक्ति , तब हम दोबारा अपनी अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा कर सकते है उद्योग चला सकते है खुद को सुरक्षित महसूस कर सकते है, हमारी सेनाओं और हथियारों को जंग लग चुका है जरूरत है उन्हें खोई हुई धार वापस लौटाने की,
तो माननीय प्रधानमंत्री प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी जी, अब ये लव लैटर लिखना बंद किया जाए, सेना को खोया आत्मसम्मान लौटाया जाए, दुश्मन ने सोये हुए सैनिकों को घर में घुस कर मारा है अब हमारी बारी है दुश्मन को उस से घर में घुस कर मारा जाए, और हाँ यदि आपसे नही होता तो तीनों सेनाओं के सरताज राष्ट्रपति जी बैठे ही उन्हें सौंप दिया जाए राज काज, यदि उनसे भी ना होता हो तो तैयार रहो तख्तापलट के लिए, आक्रोश में कब सेनाए आदेश का इंतज़ार करना बंद कर देंगी समझ भी नही पाओगे
